पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम 'इंडिया-2020' का सपना होगा पूरा ? 


ध्यान से देखें तो ऐसा लगता है जैसे मोदी-शाह के हर फैसले में लोग साथ हुआ करते थे, अचानक इरादा बदलने लगे हैं| साल की शुरुआत से ही जरा गौर कीजिये. बालाकोट एयर स्ट्राइक पर विरोध में जो भी दो-शब्द बोले गये, वे आम लोगों की जबान से नहीं निकले थे, बल्कि भाजपा  के राजनीतिक विरोधियों की तरफ से रहे| तब बड़ी आसानी ने मोदी-शाह ने समझा दिया कि ये विपक्षी लोग पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं - लेकिन साल जाते जाते लोगों ने सारी बातें आंख मूंद कर मानना भी छोड़ दिया. आखिर ऐसा क्यों? वजह जो भी रही हो   सी ए ए – एन आर सी  के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आये| ये कौन लोग रहे ये बहस का अलग मुद्दा हो सकता है, लेकिन ये वही लोग हैं जो अब तक किसी भी मुद्दे पर खामोश भले रह जायें लेकिन मोदी-शाह के विरोध में सड़क पर तो नहीं ही देखने को मिले थे|
अयोध्या पर आये फैसले से पहले तक, उच्चतम न्यायालय  तक को पक्के तौर पर यकीन नहीं रहा कि कहीं कोई विरोध नहीं होगा |तभी तो तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने यूपी के चीफ सेक्रेट्री को तलब कर हालात का जायजा लिया| उसके बाद ही फैसला सुनाया गया| बाद में तो सभी हैरान रह गये होंगे कि विरोध जैसी कोई बात हुई ही नहीं - लेकिन अभी देखिये| कैंपस में क्या हो रहा है? शहरों में क्या हो रहा है? दिसंबर से पहले सरकार को सिर्फ जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट बंद करने की जरूरत पड़ी थी| दिसंबर में दिल्ली सहित देश के कई शहरों में ऐसा करना पड़ा है|
अगर सब कुछ ठीक ठीक चल रहा था तो चूक कहां हुई - ये भी गंभीरता से सोचने की जरूरत है| किसी और को नहीं बल्कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को ही|पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम 'इंडिया-2020' के तहत जिस भारत का सपना देखे थे उससे आगे की बात भले न हो लेकिन उनका सपना न टूट सके ऐसी कोशिश तो करनी ही होगी. बात जब सपनों की आती है तो पाश याद आ ही जाते हैं - 'सबसे खतरनाक होता सपनों का मर जाना'. दुआ कीजिए 2020 का नया इंडिया कलाम के सपनों का भारत ही हो!



अशोक भाटिया
 


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