झारखण्ड की हार से सबक ले भाजपा , आगे कई राज्यों के चुनाव है
भाजपा झारखंड में भारी हार के बाद भले ही भाजपा महाराष्ट्र की तरह यह दोहराती रहे कि राज्य में वह सबसे बड़ी पार्टी है , पर यह यह केवल मन बहलाने के लिए अच्छा हो सकता है | इस हकीकत से मुहं नहीं मोड़ा जा सकता की अपनी ही गलतियों से वह आज सत्ता के बाहर है | वैसे तो हार के अनेक कारण है पर मुख्य कारणों की चर्चा करना आवश्यक है क्योकि आगे अन्य राज्यों के चुनाव भी आ रहे है और यह गलतियाँ दोबारा न दोहराई जाए | झारखंड में भाजपा की हार का बड़ा कारण मुख्यमंत्री रघुबर दास का अक्खड़ स्वभाव व पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा करना भी रहा है। रघुबर दास सरकार में वरिष्ठ मंत्री सरयू राय, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ताला मरांडी, सरकारी मुख्य सचेतक राधाकृष्ण किशोर जैसे अन्य कई वरिष्ठ नेताओं के टिकट काटने से भी पार्टी कैडर में गलत संदेश गया। ऊपर से दलबदलुओं को टिकट दिया गया। इसी कारण दो को छोड़ कर भाजपा के सभी दलबदलू नेता चुनाव हार गये। दलबदलुओं को टिकट देने से भाजपा को आंतरिक बगावत का सामना करना पड़ा। भाजपा के पचास से अधिक नेताओं ने पार्टी से बगावत कर चुनाव लड़ा जिससे पार्टी को 18 सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा।मुख्यमंत्री रघुबर दास को अपने ही मंत्रीमंडल सहयोगी सरयू राय के हाथों करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा, विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव को भी हार का सामना करना पड़ा है। इससे झारखंड में भाजपा की स्थिति बहुत शर्मनाक हो गई है। विशेषकर मुख्यमंत्री की हार ने भाजपा को झकझोर कर रख दिया है। ऐन चुनाव से पूर्व आजसू से भी गठबंधन टूटना भाजपा के लिये नुकसान दायक रहा। भाजपा से गठबंधन टूटने से आजसू को भी बहुत नुकसान उठाना पड़ा व उसके विधायकों की संख्या पांच से घटकर दो ही रह गयी | मगर आजसू को मिले वोट प्रतिशत में खासी बढ़ोत्तरी हुयी है। 2014 के विधानसभा चुनाव में आजसू को 3.68 प्रतिशत मत मिले थे वहीं इस बार के चुनाव में बढ़ कर 8.02 प्रतिशत तक पहुंच गये। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा का आजसू से पूर्ववत गठबंधन बना रहता तो दोनों ही दलों के विधायकों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हो सकती थी। मगर मुख्यमंत्री अपने सहयोगी आजसू को भी साधने में असफल रहे।
एक के बाद एक प्रदेशों में लगातार सत्ता गंवाती भाजपा को आगे यदि फिर से प्रदेशों में सरकार बनानी है तो उसे अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना पड़ेगा। प्रदेशों के नेताओं की मनमानी रोकनी होगी। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को चाहिए कि प्रदेशों में साफ छवि के ऐसे नेताओं को आगे लाना चाहिये जो आमजन से घुल मिलकर काम कर सकें। सभी पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ जुड़ सकें। भाजपा को बाहर से दल बदल कर आने वाले नेताओं को भी टिकट देने पर रोक लगानी चाहिए। क्योंकि दलबदल कर आने वाले लोगों को टिकट देने से भाजपा के जो मूल कैडर है उनमें असंतोष व्याप्त होता है। कई स्थानों पर भाजपा के पुराने नेता बगावत कर चुनाव लड़ते हैं जिससे पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ता है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को काम करने की पूरी आजादी दी जिसका फायदा उठाकर वहां के मुख्यमंत्री प्रादेशिक क्षत्रप बन गए और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी करने लगे। जिनसे उनकी नहीं बनती उनमें से कईयों की टिकट भी कटवा देते हैं। इस कारण कई प्रदेशों के भाजपा कार्यकर्ताओं में वहां के मुख्यमंत्री के प्रति रोष व्याप्त हुआ जिस कारण से भी भारतीय जनता पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ रहा है।
अशोक भाटिया
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