पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम 'इंडिया-2020' का सपना होगा पूरा ?
ध्यान से देखें तो ऐसा लगता है जैसे मोदी-शाह के हर फैसले में लोग साथ हुआ करते थे, अचानक इरादा बदलने लगे हैं| साल की शुरुआत से ही जरा गौर कीजिये. बालाकोट एयर स्ट्राइक पर विरोध में जो भी दो-शब्द बोले गये, वे आम लोगों की जबान से नहीं निकले थे, बल्कि भाजपा के राजनीतिक विरोधियों की तरफ से रहे| तब बड़ी आसानी ने मोदी-शाह ने समझा दिया कि ये विपक्षी लोग पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं - लेकिन साल जाते जाते लोगों ने सारी बातें आंख मूंद कर मानना भी छोड़ दिया. आखिर ऐसा क्यों? वजह जो भी रही हो सी ए ए – एन आर सी के विरोध में लोग सड़कों पर उतर आये| ये कौन लोग रहे ये बहस का अलग मुद्दा हो सकता है, लेकिन ये वही लोग हैं जो अब तक किसी भी मुद्दे पर खामोश भले रह जायें लेकिन मोदी-शाह के विरोध में सड़क पर तो नहीं ही देखने को मिले थे| अयोध्या पर आये फैसले से पहले तक, उच्चतम न्यायालय तक को पक्के तौर पर यकीन नहीं रहा कि कहीं कोई विरोध नहीं होगा |तभी तो तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने यूपी के चीफ सेक्रेट्री को तलब कर हालात का जायजा लिया| उसके बाद ही फैसला सुनाया गया| बाद में तो सभी हैरान रह...